विवादित ढांचा ढहाने के बाद किसने गायब कर दी रामलला की मूर्ति?

6 दिसंबर 1992 को ढांचा गिराया जा चुका था. कारसेवकों की पूरी ताकत अब मलवे को समतल बनाने में लग गई थी. ताकि वहां फिर से रामलला को जल्दी-से-जल्दी स्थापित किया जा सके. पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल, केंद्र सरकार और कल्याण सिंह की सरकार तीनों इस काम के पूरे होने का इंतजार कर रही थीं. इसी के बाद अगली कार्रवाई होनी थी.

कारसेवकों ने ढांचे का मलवा पीछे खाई में गिराया और जमीन समतल करने के काम में लगे. पंद्रह गुणे पंद्रह गज के टुकड़े पर जल्दी-जल्दी में पांच फीट की दीवार उठाई गई. नीचे से चबूतरे तक अठारह सीढ़ियां बनी. तभी पता चला मूर्तियां गायब हैं. दरअसल, ध्वंस के बाद गर्भगृह से पुजारी सत्येंद्र दास भी मूर्ति लेकर बाहर आते दिखे थे. लेकिन बाद में वह मूर्ति किसी ने गायब कर दी.

ध्वंस के बाद एक तरफ केंद्र सरकार की संभावित कार्रवाई का खतरा था. तो दूसरी तरफ मूर्ति रख अस्थायी मंदिर बनाने की अफरातफरी थी. केंद्र सरकार की ओर से अयोध्या का मामला केंद्रीय राज्यमंत्री पी.आर. कुमार मंगलम देख रहे थे. वे कई बार जानकारी ले चुके थे कि मूर्तियां रखी गई या नहीं.

कुमार मंगलम् राजा अयोध्या विमलेंद्रमोहन प्रताप मिश्रा के संपर्क में थे. राजा साहब कांग्रेस पृष्ठभूमि के थे. अयोध्या में कर्फ्यू था. दुकाने बंद थीं. आनन-फानन में राजा अयोध्या ने अपने घर से रामलला की मूर्तियां भिजवाई. जो उनकी दादी ने इसी काम के लिए अपने घर में एक अस्थायी मंदिर बना कर रखी थी.

राजा अयोध्या ने मूर्तियां रखे जाने के बाद पी.आर. कुमार मंगलम् को जानकारी दी. उसी के फौरन बाद नरसिंह राव ने कैबिनेट की बैठक बुला कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की. यह भी अजीब बात थी कि कल्याण सिंह तीन घंटे पहले ही इस्तीफा दे चुके थे. फिर भी बर्खास्तगी का नाटक रचा गया.

कैबिनेट की सिफारिश गृहमंत्री एस.बी. चह्वाण खुद लेकर राष्ट्रपति भवन गए और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने हाथोंहाथ राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना जारी की. अयोध्या अब केंद्र सरकार के हवाले थी.

रामजन्म भूमि मंदिर में रामलला की मूर्ति की भी दिलचस्प कहानी है. जो मूर्ति ध्वंस के दौरान गायब हुई वह रामलला की मूल मूर्ति नहीं थी. इस इमारत के बार-बार टूटते बनते यहां मूर्तियां भी बदलती रहीं. जो मूर्ति कारसेवकों ने गायब की वह 1949 की 22 दिसंबर की आधी रात को रखी गई थी.

चार सौ साल पहले जब मीर बाकी ने मंदिर तोड़ मसजिद बनाई. तो उस वक्त की विक्रमादित्य द्वारा रखी गई मूर्ति टीकमगढ़ के ओरछा राजमहल में चली गई. ओरछा की महारानी अयोध्या आ वह मूर्ति ले गई थी. इसीलिए ओरछा में आज भी राम ही राजा हैं. उनका मंदिर है. पर वहां के राम राजा धर्नुधर राम नहीं, रामलला है. आज भी ओरछा के मंदिर में रामलला को मध्य प्रदेश पुलिस सुबह-शाम सलामी देती है.

ओरछा में राम लला कैसे पहुंचे इसकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. ओरछा झांसी से करीब 20 किलोमीटर दूर है. यहीं पर रामराजा मंदिर है. कहते हैं कि राम रात्रि में अयोध्या में रूकते हैं और भोर होते ही अपने बालरूप में ओरछा आ जाते हैं. राम जिन्होंने शबरी, केवट, निषादराज, सुग्रीव, विभीषण से लेकर कैकेई तक सभी के साथ रिश्तों को निभाया है वो ओरछा की रानी से भी रिश्ता निभाते हैं.

राम के ओरछा आने के पीछे रानी की भक्ति से वशीभूत होना ही था. ओरछा के राजा मधुकर राधा कृष्ण के भक्त थे लेकिन उनकी पत्नी महारानी कमलापति गणेश कुंवरी राम की भक्त थीं. एक दिन राजा ने हास्य में कह दिया कि अगर तुम्हारे राम कृष्ण से ज्यादा महान हैं तो उन्हें ओरछा क्यों नहीं लाती हो.

भक्ति में भी शक्ति के परीक्षण की बात आई तो रानी ने भी ठान ली कि वो राम को ओरछा लाकर ही रहेंगी. ओरछा से कोसों दूर अयोध्या वो पैदल आईं. सरयू नदी के किनारे अपनी कुटिया बनाई और राम की तपस्या प्रारंभ हो गई. संत तुलसीदास ने भी आशीर्वाद दे दिया.

इसके बाद रानी की तपस्या को और बल मिला. कई माह की कठोर तपस्या के बाद भी राम के दर्शन नहीं हुए. रानी ने सरयू में ही छलांग लगा दी. भक्ति की पराकाष्ठा देखकर आखिरकार भगवान राम ने नदी में ही उन्हें दर्शन दिए. रानी ने अपनी इच्छा बताई. राम ने अपनी शर्त. शर्त थी कि राम जहां जाएंगे वहीं विराजमान हो जाएंगे. ओरछा में राम की ही सत्ता रहेगी राजशाही को खत्म करना होगा.

संवत् 1631 में रामनवमी के दिन ही ओरछा की रानी ने राम राजा को ओरछा सौंप दिया. इसके बाद से वहां सब कुछ परंपरा के हिसाब से चला आ रहा है. ओरछा के मंदिर में राम राजा के अलावा सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां भी स्थापित हैं. दिसंबर के महीने में यहां राम बारात निकलती है.

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