‘मरीना’ के डूबने से चार करोड़ की बर्बादी का जिम्मेदार कौन ?

 (दीपक फर्स्वाण ) टिहरी झील के जिस फलोटिंग मरीना पर पर्यटन को उद्योग का दर्जा देने पर सहमति बनी, वही मरीना सरकारी तंत्र की लापरवाही की भेंट चढ गया। चार करोड़ के इस मरीना की न तो देखरेख की गई और न ही समय पर मरम्मत। उपयोग किए बगैर करोड़ों की इस सम्पत्ति के डूबने से पर्यटन महकमे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

राज्य सरकार टिहरी झील को साहसिक पर्यटन का हब बनाने की दावे अक्सर करती है। दावे किए जाते हैं कि इस झील को इस तरह सजाया, संवारा व विकसित किया जाएगा कि पर्यटक रोमांच के अहसास से लबरेज हो जाएंगे। सरकार के दावों की पोल मंगलवार को उस वक्त खुल गई जब झील में मौजूद मरीना का एक हिस्सा पानी में डूब गया। यह मरीना चार करोड़ की लागत से वर्ष 2015 में तैयार किया गया था। चार साल की लंबी अवधि में भी सरकार इसका संचालन शुरू नहीं कर सकी। मरीना हाशिये पर पड़ा रहा। बीते साल मई माह में जरूर त्रिवेन्द्र सरकार ने इस मरीना में कैबिनेट कर देश में कीर्तिमान बनाया था लेकिन उसके बाद भी मरीना को लेकर बनाई गई योजनाए धरातल पर नहीं उतारी गईं। मरीना के खराब होने की शुरुआत कुछ महीनों पहले हो गई थी जब इसका एक हिस्सा पहाड़ में टकराने से क्षतिग्रस्त हो गया था। इसे दुरुस्त तक नहीं किया गया। धीरे धीरे मरीना का संतुलन खराब होता चला गया और इसका एक हिस्सा पानी में डूब गया।

 सबसे बड़ा सवाल यह है कि चार करोड़ की लागत से तैयार किया गया मरीना का चार वर्ष की लंबी अवधि में भी संचालन शुरू क्यों नहीं हो पाया। अगर मरीना का संचालन होता तो वह इस तरह खराब न होता और न झील में डूबता। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय बोट संचालकों ने पर्यटन विभाग से मरीना के संचालन की जिम्मेदारी उन्हें सौंपने का आग्रह किया लेकिन विभाग ने उनकी भी नहीं सुनी।

 

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