एक्सिडेंट करा कर क्यों मारे जा रहे पत्रकार

(आकाश नागर)

मोदी सरकार में माफियाओ के हौसले बुलंद है. हालात यहाँ तक ख़राब हो चुके है कि चौथे स्तंभ के प्रतीक पत्रकारों को सच लिखने पर जान से मार दिया जा रहा है। मोदी सरकार के पिछले चार साल के दौरान 30 पत्रकार बेमौत मारे जा चुके है। अब माफिया पत्रकारों को एक्सिडेंट में हत्या करा रहे है। मध्यप्रदेश और बिहार में माफियाओ ने पत्रकारों को मारकर सड़क दुर्घटनाओं का रूप दे दिया है। दो दिन में तीन पत्रकारों को एक्सिडेंट करा कर मौत के घाट उतार दिया गया है। पत्रकार अपनी जान की रक्षा के लिए सरकार से गुहार लगाते रहे .लेकिन उनको सुरक्षा नहीं दी गयी। मध्यपरदेश में ट्रक से कुचलकर मारे गए पत्रकार संदीप शर्मा ने सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मप्र के सीएम शिवराज सिंह से लेकर विधायक तक से गुहार लगाई थी। उन्होंने एसपी को दिए ज्ञापन में अपनी जान को खतरा बताया था।

इसी ज्ञापन की प्रतिलिपी पीएम से लेकर विधायक तक सभी को भेजी थी।आज सुबह भिंड में ट्रक से कुचलकर मारे गए पत्रकार संदीप शर्मा ने 3 नवंबर 2017 को पुलिस अधीक्षक भिंड को ज्ञापन दिया था। इस पत्र में संदीप ने एसडीओपी अटेर इंद्रवीर सिंह भदौरिया से अपनी और अपने ​परिजन की जान को खतरा बताया था, इस पत्र में संदीप ने पुलिस प्रोटेक्शन दिलाए जाने की मांग की थी। संदीप ने स्पष्ट लिखा था कि भदौरिया उसे आपराधिक प्रकरण में फंसा सकते हैं या फिर हत्या, एक्सीडेंट करा सकते है। आवेदक के रूप में पत्र पर संदीप के सहयोगी विकास पुरोहित का नाम भी है। इस पत्र के प्रतियां संदीप ने प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री आदि के अलावा गृहसचिव, डीजीपी, आईजी चंबल के साथ ही मानव अधिकार आयोग के अ​ध्यक्ष को भी भेजी थी, लेकिन किसी ने काई सुनवाई नहीं की थी।बिहार के आरा में बाइक से जा रहे दो पत्रकारों की हत्या स्कॉर्पियो गाड़ी से जानबूझकर कुचलकर की गई है. पहले भी पत्रकारों ने हत्या की आशंका जताई थी. इसके बावजूद यह घटना हो गई. मृतकों में दैनिक भास्कर के प्रखंड संवाददाता नवीन कुमार हैं जबकि दूसरे रिपोर्टर का नाम विनोद सिंह बताया जा रहा है. आरा जिला के गड़हनी के पास की घटना है.

बताया जा रहा है कि दोनों पत्रकारों का जिले के गड़हनी पंचायत के पूर्व मुखिया हरशु से विवाद चल रहा था. किसी खबर को लेकर पत्रकारों और पूर्व मुखिया में काफी दिनों से अनबन चल रही थी. मुखिया ने पहले भी दोनों पत्रकारों को धमकी दी थी. गड़हनी पंचायत के पूर्व मुखिया पर हत्या को अंजाम देने का आरोप लग रहा है. दैनिक भास्कर के गड़हनी प्रखंड संवाददाता नवीन सिंह और एक पत्रिका से जुड़े प्रखंड संवाददाता विनोद सिंह की हत्या में पूर्व मुखिया का नाम आया है.तीन दिन पहले 24 घंटों के भीतर बिहार और झारखंड में दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई. इससे एक बार फिर यह आशंका पुष्ट हो गई कि भारत में निर्भीक पत्रकारिता करना खतरों से भरा है. पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय संगठन कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें कहा गया था कि युद्धग्रस्त इराक और सीरिया के बाद दुनिया भर में भारत ही ऐसा देश है जहां पत्रकारों को सबसे अधिक खतरा है और जहां उनकी सबसे अधिक हत्याएं होती हैं.

वर्ष 1992 से लेकर 2015 तक भारत के विभिन्न भागों में 64 पत्रकारों को काम के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी है. इनमें से अधिकांश उन छोटे कस्बों में कार्यरत थे जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला है और उसे उजागर करने का मतलब स्थानीय अफसरशाही, राजनीतिक नेताओं और गुंडों से दुश्मनी मोल लेना है. . बिहार के सिवान में दैनिक हिंदुस्तान के ब्यूरो प्रमुख राजदेव रंजन भी माफिया डॉन से राजनीतिक नेता बने शहाबुद्दीन की कारगुजारियों की पड़ताल कर रहे थे और उनकी खोजबीन से 2014 में राजनीतिक कार्यकर्ता श्रीकांत भारती की हत्या में शहाबुद्दीन का हाथ होने के संकेत मिल रहे थे. लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता शहाबुद्दीन इस समय भी हत्या के मामले में जेल में ही हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के सक्रिय नेता चंद्रशेखर की हत्या के पीछे भी उन्हीं का हाथ माना जाता है. इस समय लालू यादव की पार्टी सत्ता में है और उनके पुत्र बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं.हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी छवि अपराधी तत्वों से समझौता न करने वाले नेता और प्रशासक की बनाई है, लेकिन पिछले कुछ समय से राज्य में बढ़ रहे अपराधों को देखते हुए अब इस छवि पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. पिछले साल उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में स्थानीय पत्रकार जागेन्द्र सिंह को जिंदा जला कर मार दिया गया था. जागेन्द्र सिंह वहां के एक विधायक के बारे में असुविधाजनक रिपोर्टिंग कर रहे थे. बहुत बाद में अचानक उनके परिवारवालों ने यह बयान दिया कि जागेन्द्र सिंह ने खुद ही स्वयं को आग लगाकर जान ले ली थी. इस बयान के पीछे राजनीतिक दबाव माना गया था.

झारखंड में भी यही स्थिति है. वहां पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह की हत्या कर दी गई. ये हत्याएं बहुत पेशेवर तरीके से की गई हैं इसलिए इनका कारण कोई छोटी-मोटी आपसी रंजिश नहीं हो सकती. इन्हें योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया है यानी इनके पीछे ऐसे ताकतवर तत्वों का हाथ है जिन्हें पत्रकारों के लेखन से परेशानी होती है. शनिवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और मुंबई प्रेस क्लब जैसी पत्रकारों की संस्थाओं ने उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश बिहार और झारखंड में हुई हत्याओं के दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग करते हुए देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार बढ़ रहे हमलों पर चिंता प्रकट की. जब पत्रकार दबाव के आगे झुकने से इनकार कर देते हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है.अनेक पत्रकार संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करते हुए मारे जाते हैं. लड़ाई के मोर्चे पर न जाने कितने पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है.

लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अखबार और टीवी चैनल अपने पत्रकारों का जीवन बीमा भी नहीं कराते. पत्रकारिता एक ऐसा अभागा पेशा है जिसमें पेंशन की कोई सुविधा नहीं है. इसीलिए बुढ़ापे में भी पत्रकार काम करते नजर आते हैं. पत्रकार संगठनों का दायित्व है कि वे देश भर में सरकार और मीडिया के मालिकों का ध्यान इन समस्याओं की ओर आकृष्ट करें ताकि पत्रकारों की सुरक्षा के बेहतर इंतजाम हो सकें और उनकी मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार के लोगों को राहत उपलब्ध कराई जा सके. यह केंद्र और राज्य सरकारों का संवैधानिक दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि पत्रकार बिना किसी खौफ के अपना काम कर सकें और उनकी अभिव्यक्ति की आजादी पर आंच न आने पाए. लेकिन खुद अभिव्यक्ति की आजादी पर बंदिशें लगाने वाली सरकारें क्या कभी ऐसा करेंगी?

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