हम उत्तराखण्ड की राजनीति में अवतार का इंतज़ार क्यों करें?

(मनु पंवार, टेलीविज़न पत्रकार )

पता नहीं यह कितना व्यावहारिक है, लेकिन अरसे से मैं एक सपना देख रहा हूं. पहाड़ के लिए सोचने, समझने वाले लोग मिलके क्या एक काम कर सकते हैं. क्या हम अलग-अलग लडाइयों के बजाय यूकेडी को ही रिवाइव करने के बारे में सोच सकते हैं? एकदम प्रोफेशनल अंदाज में. यूकेडी के मौजूदा नेताओं को ढंग से कनविंस करके. क्या ऐसा एक्सपेरिमेंट मुमकिन है?

हम पहाड के लोग न जाने क्यों किसी अवतार के इंतजार में रहते हैं. हम सोचते हैं कि कोई राम आएगा और हम अहिल्या जैसे शापित पत्थर को तार देगा. ये नहीं होने वाला भाई.

मैं फिर कह रहा हूं यह सिर्फ एक कल्पनाभर है. एक सपना है. मैं दिल्ली में कई मीटिंगों में ये उदगार व्यक्त कर चुका हूं. बहुत अच्छा रिस्पांस नहीं मिला लेकिन इस विचार को फ्लोट करने का एक फायदा ये हुआ कि कुछ और लोग इस दिशा में सोचने-समझने लगे. ऐसे विचारवान लोगों की पहचान हो गई, भले ही वो संख्या में कम हैं लेकिन वो मेरे साथ जुड़ गए. अब उन्हीं के साथ चीजें साझा कर पाता हूं.

मैं इस प्लेटफॉर्म के जरिये पहली बार इसे शेयर कर रहा हूं. मानता हूं ये बहुत जटिल काम है. लेकिन मुमकिन नहीं है. हमने दिल्ली में अपने सामने आम आदमी पार्टी को बनते-बिगड़ते देखा है. मैं फिलहाल बिगड़ने वाले पहलू पर नहीं जाऊंगा. कोई भी प्रयोग कई वजहों से फेल हो सकता है. लेकिन सराहना इस बात की होनी चाहिए कि जड़ हो चुके मौजूदा पॉलिटिकल सिस्टम में कुछ लोगों ने प्रयोग करने का दुस्साहस तो किया.

क्या हम उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय पहचान वाली यूकेडी के साथ ऐसा एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं? क्या उनके स्वयंभू नेताओं के दिमाग में ये बातें घुसाई जा सकती हैं? यूकेडी के बारे में हमें पब्लिक को ज्यादा बताने की जरूरत भी नहीं है. बस, उसे नए तेवरों, नए अंदाज, नए नारों, नए चेहरों औऱ नए विचार के साथ पेश करना है.

लोगों में ये भरोसा जगाना है कि क्षेत्रीय दल ही आपका अपना है. इन तथाकथित राष्ट्रीय दलों के नेता भी दिल्ली से तय होते हैं, एजेंडा भी दिल्ली तय करती है, उत्तराखँड सरकार की नीतियां भी दिल्ली से तय की जाती हैं. जिस पार्टी की सरकार होती है, वो पैसा दिल्ली को पहुंचाते हैं. ये एक दिन पूरे पहाड़ के बेच खाएंगे और डकार भी नहीं लेंगे. हम अपनी शर्तों पर राजनीति की दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं. हमें राजनीतिक तौर पर एक तेज तर्रार समाज बनना है.

फिर कह रहा हूं, यह सपना है जो मेरे मन में जाने कब से पल रहा है. मुमकिन है कि आपने भी कुछ ऐसा सोचा होगा। क्या इस सपने को हम हकीकत की जमीन पर ला सकते हैं? हमारे पास चेहरे भी हैं. विश्वसनीय, कर्मठ, विचारवान. उत्तराखण्ड में भी और उससे बाहर भी. क्या यूकेडी के रिवाइवल को लेकर हम सब मिलकर सोच सकते हैं?

कुछ आइडिया मेरे पास हैं. कुछ आपके पास होंगे. कुछ तीसरे के पास होंगे. सारे आइडियाज से मिलकर कुछ नया निकालते हैं न. वरना समय ऐसे ही निकलता जाएगा. चुनावबाज नेताओं, करप्ट लीडरों-अफसरों और ठेकेदारों की जमात पावर सेंटर पर कब्जा किए रखेगी. बदलना वैसे भी कुछ नहीं है.

सोचिएगा. मैं फिर कह रहा हूं. यह मेरा एक सपना है. व्यावहारिक है या नहीं, अभी मुझे नहीं पता, लेकिन मैं तब तक यह सपना देखता रहूंगा जब तक सपने देखने पर पाबंदी नहीं लग जाती.

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