मीडिया किसी चीज़ को सरल तरीके से पेश क्यों नहीं करती?

(मोहन भुलानी ) यह तो आपको पता ही है कि मीडिया को चौथे स्तम्भ का दर्ज़ा दिया गया है लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि क्या मौजूदा मीडिया निष्पक्ष है? मतलब साफ है कि मीडिया अगर चाह ले तो वह आपको सड़क पर ला सकती है या रातोंरात स्टार बना सकती है।

यह ऐसी प्रणाली है, जिसके डर के साए में हमारे नेता, अभिनेता और हमारे चहेते खिलाड़ी रातभर सो नहीं पाते, आपको हार्दिक पंड्या और मी टू वाला किस्सा तो याद होगा ही। मीडिया को यह अंदाज़ा है कि उसे अपना काम कब और कैसे करना है।

सोशल मीडिया के ज़रिये फैलाई जारी रही है सनसनी

सोशल मीडिया भी इसका ही अंग है, जो कहीं-कहीं इससे चार कदम आगे है। इस प्रणाली को हम ‘झटपट काम फटाफट’ भी कह सकते हैं क्योंकि यह रॉकेट से भी तेज़ है। यह आपको मिनटों में आसमान की बुलंदियों तक ले जा सकता है और मिनटों में छिपने को मजबूर कर सकता है।

देखिए हम देश में मीडिया को दो तरह से बांट सकते हैं। एक जो मोदी विरोधी है और एक जो मोदी भक्त है। एक बात जो समझना ज़रूरी है कि लोगों को मसाला चाहिए और मीडिया को यह बात बिल्कुल समझ आती है कि किन-किन मसालों को मिलाकर ज़हर तैयार होगा और मीडिया द्वारा इस ज़हर को बेहतरीन तरीके से मसाला की तरह पेश किया जाता है।

समझने वाली बात तो यह है कि लोग अपने काम में इतने उलझे हुए हैं कि कभी-कभी तो यह तक भूल जाते हैं कि पाकिस्तान है कौन? मगर हमारा मीडिया इसे याद कराना नहीं भूलता। हम लोग पाकिस्तान से शायद उतनी नफरत नहीं करते अगर यह मीडिया नहीं होता, हम चीन की साज़िश को भी नहीं समझ पाते अगर मीडिया नहीं होता।

हमारी ज़िंदगी में थोड़ा सुकून होता अगर मीडिया किसी चीज़ को सरल तरीके से पेश करती मगर यह बात बोलना बिल्कुल सही होगा कि मीडिया के बिना हमे लालू के घर की कलह, मोदी जी की पत्नी के बारे में औस राहुल गाँधी के आंख मारने के तरीके से बारे में जानकारी नहीं होती और ना ही हमें यह पता होता कि शाहरूख खान खाना क्या खाते हैं और करीना के बेटे ने आज क्या पहना है।

खैर, अब बात भाषा की करते हैं। भारतीय मीडिया अनेक भाषाओं में आपको जानकारी देती है, तरीके वही होंगे, बातें वही होंगी, ड्रामा वही होगा बस फर्क है भाषा का। समझने वाली बात यह है कि जो इंसान एक न्यूज़ चैनल ही देखता है, उसकी मनोदशा को समझना बहुत ही मुश्किल है।

चुनाव के एग्ज़िट पोल के वक्त वही न्यूज़ चैनल लोग देखना पसंद करते हैं, जिसमें उनकी पार्टी जीत रही होती है। उस दिन यह पता होता है कि कौन सा चैनल किस पार्टी की तरफ है।

मीडिया में दिखाई गई बातों की तह तक जाना आसान नहीं

कभी-कभी मीडिया पारदर्शी होती होगी मगर इसका आकलन करना हमारे दायरे से बाहर है क्योंकि मीडिया में दिखाई गई बातों की तह तक हम और आप नहीं जा सकते हैं और हम और आप यह कभी नहीं समझ सकते कि सच क्या था, क्या है और क्या होगा।

अगर एक न्यूज़ चैनल देखकर आपको लगता है कि देश सही दिशा में जा रहा है, सब सुकून में है सब अच्छा चल रहा है तो आपको रवीश का प्राइम टाइम देखना चाहिए, तब आपको यह पता चलेगा कि न्यूज़ चैनल की खोखली बातों में कितना दम है और कौन सही और कौन गलत इसका फैसला करना उतना ही मुश्किल होगा जितना एक बच्चे को राजनीति का पाठ समझाना।

आजकल मीडिया हमारे जीवन का हिस्सा है, हम खाना पीना छोड़ सकते हैं मगर मीडिया रिपोर्ट देखना नहीं। हम मीडिया की बातों पर इतना यकीन करने लगे हैं कि हमें अब दूसरों की बातों पर से यकीन ही उठ गया है। अगर मीडिया बोले कि वह इंसान गलत है तो हमलोग उस इंसान को उसी नज़र से देखना शुरू कर देंगे।

मज़ा तब आता है जब दूसरी पार्टी के नेता न्यूज़ चैनल्स पर आकर वाद-विवाद करते हैं, इन सब चीज़ों से मीडिया  को क्या हासि होने वाला है, यह समझ से परे है। आप न्यूज़ देखिए लेकिन सही न्यूज़ देखिए और उसका विश्लेषण भी कीजिए।

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