दुनिया को समझ आने लगी है चीन की कर्ज नीति

भारत के अपने पड़ोसी देशों के साथ घनिष्ठता या तनाव के द्विपक्षीय या क्षेत्रीय कारण रहे हैं, तथापि चीन की दक्षिण एशियाई देशों में बढ़ती सक्रियता ने इन संबंधों को प्रभावित किया है। इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभुत्व के कारण भारत को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दुनिया के अन्य क्षेत्रों की तर्ज पर दक्षिण एशिया उप-महाद्वीप में भी चीन ने भारी वित्तीय निवेश किया है। इस सदी की शुरुआत से ही चीन सार्क देशों के साथ बहु-आयामी सहयोग बढ़ा रहा है। लेकिन मदद की आड़ में देशों को बेबस करने वाली चीन की कर्ज जाल नीति को दुनिया के साथ हमारे पड़ोसी देश भी समझ चुके हैं। इससे भारत का उसके पड़ोसियों से संबंध खराब करने की उसकी मंशा को झटका लगा है। शुरुआत श्रीलंका, मालदीव से हो चुकी है। जल्द ही दक्षिण एशियाई देशों के सामने ड्रैगन की कलई खुल जाएगी।

निवेश के जरिए मजबूत हो रहा चीन 

चीन, दक्षिण एशिया में पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका और नेपाल में निवेश के जरिए खुद को मजबूत आर्थिक तंत्र के रूप में विकसित कर रहा है तथा इन देशों में अपना कूटनीतिक तथा आर्थिक प्रभाव बनाए रखने के लिए प्रयासरत है। उसकी इस कोशिश को कुछ विश्लेषक चीन का कर्ज जाल बताते हैं। उनके अनुसार, चीन की रणनीति काफी सरल है। वह छोटे और कम विकसित देशों को ढांचागत परियोजनाओं के लिए उच्च दर पर कर्ज देता है और परियोजना में हिस्सेदारी लेता है।

कर्ज न चुका पाने का अर्थ
ने जब वह देश कर्ज का भुगतान करने में असमर्थता जताता है तो चीन उसका मालिकाना हक हासिल कर लेता है।श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका एक ताजा उदाहरण है। चीन के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर, वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान भारत ने कुछ दक्षिण एशियाई देशों को दी जाने वाली मदद बढ़ा दी है। इसमें भूटान और नेपाल शीर्ष पर हैं। भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि इन देशों में भारत की विश्वसनीयता बनी रहे। भारत को नए सिरे से ‘पड़ोसी पहले’ की नीति को आगे बढ़ाते हुए संबंधों को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। चीन इस क्षेत्र में तेजी से प्रवेश कर तो रहा है लेकिन देशों की भौगोलिक स्थिति और घरेलू राजनीति के कारण, चीन के प्रभाव की सीमाएं भी हैं। इसलिए, यही समय है कि भारत सरकार अपने हितों को दृढ़ता से रखते हुए क्षेत्रीय उम्मीदों को पूरा करे और उपमहाद्वीप की एक ताकत बने।

भूटान

भूटान ने अपने पड़ोसी तिब्बत पर चीन का कब्जा होते देखा है, इसलिए वह डोकलाम मामले में शुरू से भारत के साथ है। बीजिंग किसी भी तरह भारत और भूटान की दोस्ती में खलल पैदा करना चाहता है, लेकिन फिलहाल उसकी कोई साजिश वहां कामयाब होते नहीं दिखती, क्योंकि भूटान भारत के साथ खड़ा है। चीन 1998 से लगातार भूटान के साथ किसी न किसी तरह का रिश्ता जोड़ने की कोशिशें कर रहा है। लेकिन बीते 19 साल में भूटान को लुभाने की उसकी हर कोशिश नाकाम रही।

श्रीलंका
इस देश के साथ भारत के संबंध साझे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, जातीय एवं सभ्यता पर आधारित हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच रिश्तों में खटास आ गई है। कर्ज न चुका पाने के चलते 2017 में श्रीलंका ने अपना हंबनटोटा पोर्ट चीन को सौंप दिया था। इस बंदरगाह का एक बड़ा हिस्सा 99 वर्षों तक चीन को पट्टे पर दिया गया है। भारत से श्रीलंका हमेशा कर्ज लेता रहा है और जब भारत ने इस प्रोजेक्ट पर काम करने से इनकार कर दिया तब राजपक्षे ने चीन के लिए हां कहा। 2005 से 2015 तक उनके कार्यकाल में चीनी कर्ज बेशुमार बढ़ा। 2005 में चीन का वार्षिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआइ) 10 लाख डॉलर से कम था, लेकिन 2014 में यह आंकड़ा 40 करोड़ डॉलर से अधिक हो गया था। श्रीलंका पर कुल 55 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में चीन का 10 फीसद है। श्रीलंका का यह अनुपात पड़ोसी देश भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और थाईलैंड से ज्यादा है। इन सबके बीच अब वहां के नागरिकों को लगने लगा है कि देश को चीन के हाथों में बेचा जा रहा है। लिहाजा वहां की सरकार ने भारत को अपने यहां निर्माण कार्यों के लिए आमंत्रित किया है।

मालदीव
यहां अब्दुल्ला यामीन की सरकार आने के बाद से भारत की स्थिति काफी कमजोर हो गई थी। इसी साल फरवरी में राष्ट्रपति यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा विपक्षी नेताओं और जजों को गिरफ्तार कर लिया था तो भारत ने आपातकाल का विरोध किया था। तब से मालदीव चीन और पाकिस्तान के करीब चला गया था। मालदीव को यामीन सरकार ने चीन के कर्ज के मकड़जाल में उलझा दिया है। बीजिंग ने यहां आधारभूत संरचना परियोजनाओं में बड़े निवेश किए हैं। उसने मालदीव हवाई अड्डे को अपग्रेड करने के लिए 830 मिलियन डॉलर निवेश किए हैं। साथ ही वह 25 मंजिला अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स और अस्पताल भी बना रहा है। लेकिन हाल ही में सोलिह के राष्ट्रपति बनने के बाद भारत के लिए अपने रिश्तों को सहेजने का नया मौका है। वहां की नवनिर्वाचित नेतृत्व ने भारत और अमेरिका से चीन के कर्ज से छुटकारा दिलाने के लिए आर्थिक मदद की मांग की है।

नेपाल
पिछले तीन साल में चीन का असर नेपाल में काफी बढ़ा है। चीन ने हाल ही में नेपाल को अपने चार बंदरगाहों के इस्तेमाल की अनुमति देने वाले करार पर हस्ताक्षर किया है। चीन और नेपाल के अधिकारियों ने काठमांडू में ट्रांजिट एंड ट्रांसपोर्ट एग्रीमेंट के प्रोटोकॉल के तहत इन चार बंदरगाहों के अलावा अपने तीन भूमि बंदरगाहों के इस्तेमाल की भी इजाजत दी। चीन इसके पहले जनवरी में चीनी फाइबर लिंक के जरिये 1.5 गीगाबाइट प्रति सेकंड की स्पीड वाली इंटरनेट सेवा मुहैया करा चुका है। हालांकि नेपाल के प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद (केपी) शर्मा ओली की हालिया भारत यात्रा ने दोनों अभिन्न मित्र देशों के बीच आपसी संबंधों की नई नींव रखी है। ओली ने इस बार प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले भारत का रुख करके जो सद्भाव दिखाया उससे चीन बौखला गया। अपने चार साल के कार्यकाल में तीन बार नेपाल जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत के लिए नेपाल नेबरहुड फस्र्ट पॉलिसी में सबसे पहले आता है। नेपाल की एक बड़ी आबादी भारत में नौकरियां या अन्य तरह के रोजगार से जुड़ी है। नेपाल और भारत के बीच आवाजाही के लिए वीजा की जरूरत नहीं पड़ती। भारतीय रुपया नेपाल में बेधड़क चलता है। नेपाल अपनी जरूरत का अधिकांश सामान भारत से लेता है। नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभळ्त्व को रोकने के लिए और पड़ोसी धर्म निबाहने के लिए भारत ने नेपाल को दी जाने वाली सहायता राशि में पिछले साल की तुलना में 73 फीसद तक वृद्धि की है। भारत-नेपाल के बीच काठमांडू-रक्सौल रेल लिंक पर समझौता हुआ है। भारत इस परियोजना को और विस्तार देकर चीन के रेल लिंक को चुनौती देने की कोशिश में है।

पाकिस्तान
चीन पाकिस्तान को अपना सबसे अहम साझेदार मानता है। आंतक पोषित इस देश में चीन की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं। लेकिन इनमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा सबसे अहम और बड़ी निवेश परियोजना है। जिसमें 62 अरब डॉलर से अधिक का निवेश होने का अनुमान है। सीपीईसी बलूचिस्तान के बीचोबीच है। लेकिन वहां के नागरिक इस परियोजना को सरकार और चीन की दमनकारी नीति मानते हैं। इसी का परिणाम है की बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने कराची स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास में हमला किया था। यहीं नहीं पाकिस्तान चीन के भारी कर्ज से भी दबा हुआ है। पिछले पांच सालों में पाकिस्तान पर कर्ज 60 अरब डॉलर से बढ़कर 95 अरब डॉलर हो गया है। बढ़ते कर्ज से परेशान इस देश ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ओर देखना शुरू किया, लेकिन वहां से भारत के साथ संबंधों की बहाली के दबाव ने उसे अपनी नीति में बदलाव के लिए विवश किया ह

(स्मिता तिवारी। लेखक इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्‍ड अफेयर्स, नई दिल्ली की पूर्व रिसर्च फेलो हैं

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