संस्कृत भाषा का भविष्य संवारने के लिए योगी सरकार की पहल

देश में ऐसा पहली बार हो रहा है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय के बाद राज्य में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां अब संस्कृत भाषा में भी जारी करने की शुरुआत कर दी है। इससे पहले सरकारी प्रेस नोट केवल त्रिभाषा हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू में जारी किए जाते रहे हैं। प्रदेश सरकार चाहती है कि संस्कृत बोलने और जानने वाले लोगों तक सरकार की उपलब्धियां पहुंचें। जैसे हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू भाषा भाषियों को उनकी भाषा में सरकार के काम-काज की जानकारियां मिलती रही हैं, उसी तरह संस्कृत बोल-पढ़ रहे लोगों तक भी सरकार अपनी बात पहुंचाना चाहती है क्योंकि यह सरकार उनकी भी है। उन्हे भी ये लगना चाहिए कि शासन उनका भी है और उनकी भाषा में सब बताया जा रहा है।

सरकारी सूत्र बताते हैं कि अभी तो ये शुरुआत है। इसकी धीरे-धीरे लोगों को जानकारी होगी। सरकार की यह भी कोशिश है कि वाराणसी में संस्कृत विश्वविद्यालय में इसका प्रचार-प्रसार कराया जाए। वहां लगभग पचास हजार छात्र सम्बद्ध विभिन्न कॉलेजों में संस्कृत पढ़ रहे हैं। यदि उन तक सरकार अपना नया मंतव्य साझा करने में सफल रही तो यह संस्कृत भाषा के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। मातृभाषा संस्कृतियों की जड़ होती है। आर्थिक विकास भाषाओं की बलि ले रहा है। इस समय हमारे देश में लगभग चार सौ क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं। सबसे ज्यादा खतरा छोटे छोटे आदिवासी समुदायों की भाषा पर मंडरा रहा है। ऐसी कई भाषाएं हैं, जो सिर्फ बोली जाती हैं। उन्हें अभी तक लिपिबद्ध नहीं किया गया है। ऐसी ही एक भाषा है गोंडी। छह राज्यों में करीब 1.2 करोड़ लोग इसे बोलते हैं लेकिन अभी तक गोंडी के लिए कोई मानक लिपि नहीं है।

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